टाइम ट्रेवल

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Chapter – 4

एक अनजानी और अजीब सी जगह, एक तरफ सनिम बेहोश थी …।
उसके बगल में अभय बेहोश था…। उनसे कुछ दुरी पर क्रिया भी बेहोश पड़ी थी ।
और पैरों के पास आरुश भी बेहोश था।
थोड़ी देर बाद सनिम की आँखें खुलती है पर उसके सर में काफी तेज दर्द हो रहा था।
वो अपना सर पकड़ के बैठ जाती है। फिर धीरे से अपने चारों तरफ देखती है, उसे सब दिखते है।
वो अभय को देखती ही रहती है और सोचती है, “वाओ,ये कितना हैंडसम है”! पर फिर वो याद करती है कि वो यहाँ आयी कैसे?
वो खुद से बोलती हैं,”ओ शिट मतलब मैं किडनैप हो चुकी हूँ, पर एक मिनट मै खाई से गिरने पर बची कैसे?
या मै मर चुकी हूँ!
पर फिर ये लोग कौन हैं क्या ये सब मेरे पार्टनर है”, फिर वो कहती है, “चलो पहले उठाऊ तो इन्हें।”
सनिम सभी को उठाती है।
सभी आँख मलते हुए उठते है। सभी सनिम को देखकर एक साथ कहते है, “कौन हो तुम”? फिर सब एक दूसरे को देखते है। सनिम कहती है, “मुझे भी आप लोगों से यहीं पूछना है,”कौन है आप सब”? क्रिया कहती है, “एक मिनट शायद हम सभी एक दुसरे को नहीं जानते है”।
आरुश-“फिर हम सब यहाँ कर क्या रहे है”?
अभय-“मै समझ गया, ये सब उन गोरों की चाल होगी”।
सनिम-“किसकी”?
अभय-“देखिये मेम साहिबा, हम जानते है कि आप उन्हीं में से एक है। ये उन धूर्त्त फिरंगीयों की ही चाल है। मगर उन्होंने आपको और इस बच्चे को क्यों पकड़ा?
आरुश-“मगर यहाँ बच्चा कौन है? इन दोनों औरतों के साथ तो कोई बच्चा नहीं है”।
क्रिया-“वो तुम्हारी बात कर रहे है। मगर मुझे किडनैप करने वाले गुंडे थे और वो काले थे। उन लोगों ने आप लोगों को भी किडनैप किया, पर क्यों?
सनिम-“हाँ, मेरे पीछे भी तो गुंडे ही थे और वो भी गौरे तो नहीं थे”।
आरुश-“हमारे किडनैपरस दिख क्यों नही रहे और हमारे हाथ क्यों खोले है? फिर कोई रोबो भी नहीं है यहाँ।”
सनिम-“रोबोट क्यों आएगा भला इस सब में”
अभय-“एक मिनट शायद हम सब कुछ और बोल रहे है, और गोरों से मेरा मतलब है ‘फिरंगी, अंग्रेज’ जिनका अभी शासन है, कोई काला-गौरा आदमी”।
क्रिया-“क्या बकवास कर रहे हो, ये सब तो तब की बात है जब हमरा देश गुलाम था, अब तो आजादी के 16 साल हो गये है।
सनिम- हाँ, एक मिनट क्या 16 साल, मैडम आजादी के 76 साल हो गये है।
आरुश-“क्या गधों के बिच फस गया, आप लोगों की या तो हिस्ट्री बहुत खराब है या फिर दिमाग!
क्यूँकि आजादी के 136 साल हो गये है।
सनिम-“ओ बच्चे कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया क्या, जो भविष्य में चलें गए अभी आजादी के 76 साल ही हुए है”।
क्रिया-“तुमने भी कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया फिर तो”।
अभय-“आप सब क्या बोल रहे है, हमें आजादी मिली कब?
क्रिया, सनिम, आरुश एक साथ कहते है,”1947″
आरुश- “हाँ, चलो कुछ तो पढ़ा है इन लोगों ने”।
अभय (खुश होते हुए)- “क्या,हम 1947 में आजाद हो जायेंगे, पर अभी तो 1913 है”।
क्रिया- “अब ये अलग बवाला है, अभी 1973 चल रहा है, समझाओ कोई इसे”।
सनिम (थोड़ा डरते हुए अब )-“अभी 2023 है”।
आरुश (सन्कोच से)-“2083” है अभी”।
अब सभी थोड़ा हैरान और डरे हुए थे। सनिम- यार ये सब कोई मज़ाक तो नही है ना, क्यूँकि ये मजाक काफी बुरा है।
अभय- शायद हम सभी ठीक है, और ये कोई मजाक नहीं है।
क्रिया-“मुझे लगता है कि हम सभी को अपने बारे में बता के और हम यहाँ कैसे आए, इन सब से शुरू करना चाहिए।

सब इस बात से सहमत होते है।
सबसे पहले क्रिया कहती है,”मेरा नाम क्रिया पाठक है,और मै एक वकील हूँ और मेरे यहाँ 1973 चल रहा है, मै बम्बई से हूँ तो वहीं एक जंगली इलाके में मुझे कुछ लोगों ने पकड़ लिया जो मेरे दुश्मन थे,और मुझे एक खाई से फेक दिया”।
सनिम-“मै सनिम हूँ और मै एक पत्रकार हूँ और मै भी मुंबई में रहती हूँ। वो बम्बई ही आगे मुंबई है तो वहीं और मेरा समय 2023 है।
मै एक सनसनी खबर के पिछे थी तो कुछ गुंडे मेरे पिछे लग गये और मै गलती से शायद पैर फिसलने से खाई में गिर गई”।
आरुश-“मेरा नाम आरुश है, और मै 17 का हूँ और मेरे यहाँ समय 2083 है।
मै भी मुम्बई में रहता हूँ और मै एक जंगली इलाके में गया था और वहाँ एक खाई से मैंने सुसाइड करने की कोशिश की थी”।

इस पर सब चौक जाते है, क्रिया पूछ्ती है,”पर क्यों”?
आरुश-“इट्स पर्सनल”!
अभय-“ना जाने कैसी पीढ़ी हैं ये, मै अभय सिंह हूँ और मै एक आजादी दल का मुखिया हूँ।
मेरा समय 1913 है और मै बम्बई में रहता हूँ।
उस समय अंग्रेज अफसर मेरे पिछे थे और मै भी जंगली इलाके में था।
मेरे घोड़े का पैर फिसला और मै एक खाई में गिर गया।
सनिम-“मतलब आप एक क्रांतिकारी हो”?
अभय-“हाँ”
आरुश-“शायद हम सब एक ही खाई से गिरे है, अलग अलग समय में”।
क्रिया-“मुझे तो अभी ये सब काफी सपने जैसा लग रहा है। मतलब मेरा भविष्य और भूत एक साथ है”।
सनिम-“हाँ, मेरा भी”।
आरुश-“पर मेरा तो भविष्य कोई है ही नही”।
अभय-“और मेरा भूत”।
सनिम-“पर ये कौन-सी जगह है अब”?

अब सब अपने आस-पास देखते है। वो लोग किसी जंगली इलाके में होते है।
आरुश-“फक यार ये कौन-सी जगह है”।
सनिम-“सबसे पहले तो अपनी जुबान सम्भालो। तुमसे बड़े लोग बैठे है यहाँ और जो तुमसे बहुत ज्यादा बड़े है”।
आरुश-“सच में हम यहाँ फसे है और आप यहाँ मुझे बोलने का तरीका सीखा रही है”।
क्रिया -“दोनों लड़ना बंद करो”।
अभय-“ये जगह पता नही कौन से समय में है”?
सनिम-“अब यहाँ एक जगह,खड़े रहने से कुछ तो होगा नहीं, कहीं कुछ हो आगे ही देखते है”।

सब एक साथ आगे बढ़ते है, वहाँ सिर्फ अँधेरा होता है।
क्रिया-“काश हमारे पास टोर्च होती”।
अभय-“हाँ,मशाल से भी काम चल जाता”।
आरुश-“एएएक सेकंड हमे अभी इस वक़्त मशाले की क्या जरूरत”?
अभय-“मशाले नहीं मशाल। मतलब आग, समझे”।
सनिम-“अरे हाँ, मेरा फोन उसमें भी तो टोर्च है”।
पर उसका फोन उसके पास नही है”।

आरुश कहता है, “सच में आपको अभी भी अपने फोन को अपने साथ लेकर घूमना पड़ता है”।
फिर वो अपनी घड़ी की तरफ देखता है और कहता है,”हमारे समय में तो हमारी एस वाच से सब जुड़ा हुआ है और हम उसे अपनी आँखों से ही स्केन कर लेते है। अब सारी टेक्नोलॉजी हमारे हाथों में है। बस हाथ को स्क्रॉल करो”।

सनिम-“हो गया हो तो टोर्च जलाओ”।
आरुश-“आआअ वो ये पता नहीं क्यों यहाँ काम नहीं कर रहा है”।
क्रिया-“बेडा गर्क, तो तुम अभी ये सब डिंगे क्यों हाक रहे थे”।
तब तक अभय आग जला के ले आता है और कहता है,”यहाँ कोई यन्त्र काम नहीं आएगा तो अपने-अपने समय के यन्त्र अपने पास ही रखे”।

सनिम-“अरे वाह आप कितने समझदार हो”।
अभय (मुस्कुराते हुए)-“बचपन से”।
फिर सब उस रोशनी के सहारे चलने लगते है तभी क्रिया का पैर एक झाड़ी में लग जाते है और वो नीचे गिर जाती है। जिससे उसकी चूड़ियाँ टूट जाती है”। सनिम-“आप ठीक है, क्रिया जी”? वो संभाल कर उसे उठाती है। फिर सभी काफी देर तक आगे की तरफ किसी छोर की तलाश में जाते रहते है। वो सब एक जगह आके रुक जाते है,सब थक जाते है।

आरुश-“ओ गॉड एक तो कुछ मिल नहीं रहा है, ऊपर से अँधेरा और अब तो भूख और प्यास भी लग आयी है। कहाँ फंस गया मै”।
सनिम-“हाँ,हम कब से चल रहे है और कहाँ जा रहे है कुछ समझ नहीं आ रहा”।
क्रिया-“शायद हम कहीं जा ही नहीं रहे है”!
अभय-“मतलब”?
क्रिया-“ये देखो यहाँ मेरी चूड़ियाँ गिरी थी और ये अब भी यही है। मतलब जहाँ से हमने चलना शुरू किया था हम वहीं है”।
सब चुप हो जाते है।

आरुश-“मतलब ये एक लूप है। शायद इसके बारे में हम ये बोल सकते है कि टाइम में कुछ ऐसा हुआ होगा, जो एक साथ कई अलग अलग समय का रास्ता खुल गया है। जैसे कोई दरवाजे की तरह।
जैसे कई टाइम ट्रेवल की कहानियो में होता है।
एक समय से दुसरे समय जाना, हम सब अपने समय से निकले तो, पर किसी और समय में नहीं गए, हम सब एक लूप में फस में गए”।
सनिम-“पर हम ही क्यूँ”?
क्रिया-“पता नहीं”!

सनिम-“अब तो मुझ में चलने की हिम्मत भी नहीं है”।
ऐसा बोल के वो एक पेड़ के सहारे बैठ जाती है।
तभी वो पेड़ के दूसरी तरफ चली जाती है और एक मिनट के लिये उसकी चिख निकल जाती है। सब जल्दी से वहाँ जाते है। सभी पेड़ को छूते ही दूसरी तरफ चलें जाते है।
सब एक साथ कहते है,”अब ये क्या था”?

दरअसल वो पेड़ था ही नहीं, वो एक भ्रम था।
क्रिया-“ये क्या चीज है अब”? सब लोग सामने देखते है। सामने एक दानव था,जो दिखने में काफी डरावना था ।और अब वो उन्हें हि घूर रहा था ,
जैसे की उन्होंने उसके इलाके में आ कर कोई गलती कर दी हो।
वो भारी कदमों से उनकी तरफ आता है,उसका एक एक कदम करके उनके तरफ आ रहा था और उसके चलने से धरती हिल रही थी …।
वो अपना एक हाथ उठा के एक हि बार में उन सब को काफी दुर फेक देता है,और अब वो दौर के उनकी तरफ आ रहा होता है उन्हें कुचलने के लिए .।
जैसे हि वो उन सब पर अपना पैर रखने वाला होता है,कि तभी सनिम और क्रिया जल्दी से एक पत्थर उसके पैर के अंदर रख देती है,वो पत्थर काफी नुकिला होता है,तो उसके पैर में चुभ जाता है।
अभय जल्दी से उसके ऊपर चढ़ के उसके आँखों में एक नुकिला पत्थर डाल देता है,वो दानव दर्द से और गुस्से में आ जाता है और अब एक हाथ से अभय को मार के गिरा देता है।
अभय-“सब एक साथ उस पर हमला करेंगे”।
वहाँ काफी सारे नुकीले पत्थर होते है सभी एक साथ उन नुकिले पत्थर से उसपे हमला करते है।
आखिरकार दानव गिर जाता है,वो सब एक लंबी सास छोड़ते है।
अभय-“ये दरवाजा कैसा खुला अब”।
वहाँ एक दरवाजा खुला होता है जो काफी विशाल था।
सब उस दरवाजे के अंदर जाते है और अंदर जाते हि हैरान हो जाते है।
अंदर एक अलग हि दुनिया होती थी चारों तरफ तारे और ग्रह थे और सब घुम रहे थे …।
एक अलग हि रहस्यमय सा वातावरण था,उन्हें अब अपने शरीर में ना तो भूख,प्यास और थकावट महसूस हो रही थी सब खत्म हो गया….।
वहाँ एक अलग हि प्रकाश थी,पर उस प्रकाश का न तो अंत दिख रहा था और ना आरंभ।
तभी वहाँ एक बहुत सुन्दर स्त्री आती है,और उन्हें देख कर मुस्कुराते हुए कहती है,”आप सभी का समय लोक में स्वागत है,मै यहाँ कि परीचारीका हुँ।
अभय-“हम है कहाँ”?
क्रिया-“बहरे हो,अभी उसने बोला तो समय लोक”।
परिचारीका मुस्कुराते हुए कहती है,”जी ये समय लोक है,वैसे तो समय हर जगह विद्ययमान है,पर ये इसका मुख्य द्वार है जहाँ से आप आए है,और जो दानव आपने गिराया है,वो इस द्वार का कल्पना प्रहरी था।
आपको उसे गिराने कि कोई जरूरत नहीं थी,वो केवल कल्पना था,वो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता,और ये द्वार आप लोगों के लिए हि खोले गए है,क्यूँकि काल देव को पता था की आप लोग आने वाले है”।
क्रिया-“जब वो कुछ था,हि नहीं तो उसने हम पर हमला क्यों किया”?
आरुश-“और हम यहाँ कैसे आए,मतलब ये सब क्या है”?
सनिम-“क्या हम लोग मर चुके है,या मरने वाले है”?
परिचारिका-“जी नहीं,आप लोग नहीं मरे और हाँ,मरना मनुष्य को है हि,पर आप अभी मरेंगे या नहीं ये मुझे नहीं पता क्यूँकि ये काम तो यमलोक का है समयलोक का नहीं।और आप यहाँ कैसे आए,क्यों आए,तो ये सब निर्धारित था।
कभी कभी अलग अलग समय में अलग अलग समय के द्वार खुल जाते है,बाद में उन्हें हमें ठीक करना पड़ जाता है।
अभय-“तो हम सब एक साथ कैसे?मतलब या तो भविष्य होना चाहिए या भूत या वर्तमान”।
परिचारिका-“ये तो आप पर है,जो आपका के लिए वर्तमान है वो किसी और के लिए भविष्य या किसी और के लिए भूत,मगर यहाँ तो सब समय एक साथ हमेशा चल रहे है।
क्रिया -“अरे यार ये सब क्या पूछ रहे हो तुम लोग,ये पूछो कि हम क्या अपने समय पर जा पाएंगे”?
परिचारिका-“अवश्य जा पायेंगे ये देखिये यहाँ,अलग अलग समय के द्वार है,इन में से एक द्वार आप सभी को आप लोगों के समय में पहुचादेगा।किंतु वो द्वार कौन सा है वो मुझे नहीं पता”।
सब एक साथ उसे देखते है।
क्रिया-“अरे पर फिर हम क्या करेंगे”?
परिचारिका-“द्वार खोजें”।
आरुश-“वो लोग कौन है”?
परिचारिका-“वो जो नीचे है वो सेवक है और बाकी सब समय के रूप है,जैसे दिन,मास,मौसम,प्रहर,युग।
सभी काल देव के कहे अनुसार अपने अपने समय में है मगर उनका एक प्रतिरुप यहाँ है”।
परिचारिका गायब हो जाती है,अब वो सभी अपने सामने कि और देख रहे होते है,जहाँ उन्हें बस दरवाजे हि दिख रहे थें..।
आरुश-“व्हाट द हेल ये सब क्या है?इतने दरवाजे,इनमे से हम सही दरवाजा कैसे खोजें”?
अभय-“देखते है,कैसे खोजें”।
सबसे आगे अभय एक दरवाजे की तरफ बढ़ता है,उसके पीछे सब चलते है,वो एक दरवाजे को पकड़ता है फिर सभी की ओर देख के उसे खोलता है।
अब सब उस दरवाजे से अंदर जाते है,अंदर का नजारा कुछ अलग सा था,चारों तरफ कोई बड़ी सी चक्र जैसी चीज़ घुम रही थी ,और लगातार अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी …।
क्रिया और आरुश अभय और सनिम से थोड़े आगे चल रहे थें.।
सनिम-“अभय मुझे तुमसे से कुछ कहना है”।
अभय-“हाँ,बोलो क्या कहना है”?
सनिम-“देखो मुझे नहीं पता की इस वक़्त ये बातें करना ठीक है भी या नही मगर मेरे लिए ये जरूरी है क्योंकि हम शायद फिर मिले नहीं,और पता नही कैसे और कब पर मै तुम्हें पसंद करने लगी,और बस एक बार मुझे तुम्हें गले लगाना है पर जब तुम चाहो”।
अभय-“इस वक़्त,मैंने कभी किसी स्त्री को अपने जीवन में नहीं लाने का प्रण लिया है”।
सनिम-“हम्म,समझ सकती हुँ”।
तभी आरुश कि एक चीख गूंज उठती है,वो दोनों उस तरफ भाग कर जाते है,आरुश एक चक्र में फसा हुआ होता है और लगातार अंदर की तरफ जा रहा होता है,क्रिया ने उसका हाथ मजबूती से थामा होता है और ऊपर की तरफ खींच रही होती है,वो दोनों भी क्रिया कि मदद करने लगते है।तभी कुछ अज़िब सी चीज़ हाथों में कुल्हाड़ी जैसा कुछ लिए उनकी तरफ दौर के आता है,सब एक साथ चिला देते है।सनिम ने एक हाथ से अभय का हाथ पकड़ा हुआ है,और अभय ने क्रिया का,सनिम उछल के एक लात उस अज़िब से चीज़ के मुँह पर मारती है,जिससे वो भोखला जाता है और वो एक वार सनिम के गले पर करता है,सनिम जल्दी से अपना गला बचा तो लेती है पर एक हल्का निशान उसे लग जाता है और उसका खुन निकल जाता है।अभय एक बार सनिम की तरफ देखता है फिर वो उस दानव को मारने लगता है और नीचे एक चक्र में गिरा देता है।पर तभी उसी के जैसे और बहुत सारे उनके पास आने लगते है।
सब जल्दी से आरुश को बाहर निकलते है और वापस दरवाजे की तरफ भागते है,दानव उनके पीछे है और वो सभी भाग कर दरवाजे को पार कर लेते है।और अब सभी दरवाजे के उस पार लंबी सांसे ले रहे होते है,अभय जल्दी से सनिम को गले लगा लेता है।
अभय(गले लगाते हुए)-“तुम ठिक हो,मुझे तो लगा की…
सनिम-“मै ठिक हुँ,और अब तो यहाँ वापस निशान भी गायब हो गया और दर्द भी नहीं हो रहा है”।
क्रिया -“यहाँ हम भी है,हमसे भी हाल चाल पूछ लो”।
अभय(झेपते हुए)-“हाँ,आरुश तुम ठिक हो”?
आरुश-“हाँ,मै अब काफी ठिक हुँ।मुझे अब लग रहा है की मैंने अपनी जान लेनी चाहि कितनी बड़ी गलती करी मैंने,अभी एक पल में मुझे जब शायद मै मौत के करीब था,तो मुझे काफी कुछ मालुम चल गया”।
क्रिया(उसके सर पर हाथ फेरते हुए)-“कोई बात नही होता है कभी कभी ऐसा”।
अभय-“अब हमें किसी और दरवाजे के अंदर देखना चाहिए”।
सब अब दुसरे दरवाजे के अंदर जाते है,वहाँ सब कुछ बंजर सा होता है और एक खाली ज़मीन होती है।
अभय-“हम काफी देर से चल रहे है,यहाँ तो कुछ भी नही है शायद हमें कोई और दरवाजा को अब देखना चाहिए”।
सनिम-“ये देखो,ये बिलकुल वैसी ही खाई है जहाँ से मै गिरी थी”।
सब उसे देख कर हैरान होते है।
क्रिया-“हाँ,ये वहीं खाई जहाँ से हम सब गिरे थे”।
आरुश-“पर अब इसका यहाँ होने का क्या मतलब हुआ”?
अभय-“शायद अगर हम अब ठिक इससे भी वैसे ही गिरे,तो हम शायद अपने समय में लौट जाए”।
क्रिया-“और अगर ऐसा नहीं हुआ तो,शायद हम मर भी जाये “।
आरुश-” इससे पहले की ऐसा कुछ हो,मै कहना चाहता हूँ की आपलोग मुझे बहुत याद आओगे आपलोग मेरे पहले अच्छे दोस्त हो”।
अभय-“मुझे भी आप सब याद रहोगे,और आप सब मेरे लिए खास रहोगे सनिम आप भी”।
सनिम और क्रिया -“हमें भी आप सब याद आओगे”।
सभी एक दुसरे का हाथ पकड़ कर एक साथ उस खाई में कुद जाते है।