अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह शुभ तिथि 24 अक्टूबर दिन मंगलवार को है। इस त्योहार को अधर्म पर धर्म की जीत के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था और मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का अंत किया था। इसलिए यह पर्व विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। रामलीलाओं दशहरे के दिन रावण के साथ मेघनाथ और कुंभकरण के पुतले का भी दहन किया जाता है। इस दिन के साथ ही दुर्गा पूजा का समापन हो जाता है। आइए जानते हैं दशहरे की पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व…
दशहरा तिथि अबूझ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, दशहरा तिथि एक अबूझ मुहूर्त माना जाता है अर्थात इसमें बिना कोई मुहूर्त देखे, सभी शुभ कार्य किए जा सकते हैं। अगर आप कोई नया व्यापार शुरू कर रहे हैं या फिर कुछ खरीद रहे हैं तो इस मुहूर्त में शुभ कार्य करना हमेशा शुभ फलदायी माना जाता है। इस साल दशहरा पर कई शुभ योग का भी निर्माण हो रहा है, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहे हैं।
महत्व
ये पर्व असत्य पर सत्य की जीत और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन 10 दिन से चलने वाले युद्ध में मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया था और भगवान राम ने रावण का अंत करके लंका पर विजय प्राप्त की थी। इस वजह से इस दिन शस्त्र पूजा, दुर्गा पूजा, राम पूजा और शमी पूजा का महत्व है। इन दोनों घटनाओं की वजह से इस पर्व को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है। इसके साथ ही इस दिन चंडी पाठ या दुर्गा सप्तशती का पाठ व हवन करने का विशेष महत्व है।
पूजन विधि
दशहरे की पूजा दोपहर के समय करना उत्तम रहता है।
- इस दिन घर के ईशान कोण में 8 कमल की पंखुड़ियों से अष्टदल चक्र बनाया जाता है। इसके बाद अष्टदल के बीच में अपराजिताय नमः: मंत्र का जप करना चाहिए ।
- मां दुर्गा के साथ भगवान राम की पूजा करनी चाहिए।
- इसके बाद माता जया को राइट और विजया को लेफ्ट तरफ स्थापित करें।
- अब माता को रोली, अक्षत, फूल आदि पूजा की सामग्री अर्पित करें और भोग लगाएं।
- माता की आरती भी करें और जयकारे भी लगाएं।
- कुछ जगहों पर गाय के गोबर से 9 गोले व 2 कटोरियां बनाई जाती हैं।
- इन कटोरियों में से एक में सिक्के और दूसरी रोली, चावल, जौ व फल रख दें।
- इसके बाद प्रतिमा पर जौ, केले, मूली और गुड़ आदि अर्पित कर दें।
- अगर बहीखाते या शस्त्रों की पूजा कर रहे हैं तो पूजा स्थल पर इन चीजों को भी रख दें और इन पर भी रोली व अक्षत लगाएं।
- इसके बाद यथाशक्ति अनुसार दान-दक्षिणा दें और गरीबों व अवश्य को भोजन अवश्य कराएं।
- शाम के समय रावण दहन हो जाए तो शमी की पत्तियां अपने परिजनों को दे दें।
- फिर सभी घर के बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें।