सामने बस अंधेरा था और उस पर झुनकी की निगाहे टिकी थी। वो दीवार को गौर से निहार रही थी और उसकी आंखों के आगे सब चल रहा था। वो सोच रही थी जिस रमेश के साथ रहने के लिए उसने ऐसा किया वो साथ तो है लेकिन इस तरह साथ रहने की तमन्ना उसने तो नही की थी। कल कई महीनों के बाद रमेश को देखा था। बहुत ही बूढ़ा लग रहा था। हाय मुझे देख कर कैसे उसकी आंखे चमकने लगी थी …। लेकिन उसको छू नही पाई। महसूस नहीं कर पाई। इसके लिए सारे अपनो को किस हालत में छोड़ दिया जिसकी वजह से इस काल कोठरी में हूं…। तभी बाहर से आवाज आई कैदी नंबर 2224 तुम्हारे पति की अस्पताल में मौत हो गई है, जो महीने से कौमा में थे …।
झुनकी ने सोचा इतने दिन जी कैसे गया? चलो कम से कम उसके क्रियाकर्म के बहाने से ही तो मुझे पैरोल मिल जाएगा। थोड़ा अपने घर घूम आऊंगी, लेकिन रमेश वो कैसे आएगा? उसके बिना तो घर जाना भी बेकार है। इधर जेल में कम से कम उसकी आहट तो है। खुशबू तो है। उसके होने का एहसास तो है …और वो फिर शांत हो कर बैठ गई और अपने अतीत के पन्नो को अपनी सोच में उलटने लगी…। कैसे वो महारानी की तरह रहती थी लेकिन सब कैसे बिखर सा गया। कैसे अपने घर से इस कालकोठरी में आ गई …।
ये वो आखरी रात थी जब वो अपने घर में थी और रमेश से मिलना नामुमकिन सा था। वो रमेश के बिना रह नहीं पा रही थी। कम से कम 20 साल से रमेश को उसने अपने आस पास ही रखा था। उसकी शादी तक नहीं होने दी। उसको कितना बहला फुसला कर रखा था, ये तो वही जानती थी….।
रात से सुबह होने को आई पर झुनकी की आंखों से नींद कोसों दूर थी। कई दिन कई रात बीत गए लेकिन रमेश से मिल नही पाई थी। ऐसा नहीं था कि रमेश उससे बहुत दूर था। बस उन दोनो के दरमियान एक दीवार और एक बांस की टाट थी। झुनकी का घर ईंट का था और रमेश का टाट यानी की बांस और घास फूस से बना हुआ था। झुनकी की बहू दूसरे कमरे में उसके बेटे के साथ ही लेटी थी और झुनकी की जवान बेटी और छोटा लड़का सामने चारपाई पर थें और बीमार पति अलग ही चारपाई पर लेटा करवटें ले रहा था। उसको लगता था अब उसके भगवान के पास जाने के दिन करीब आ गए थें।
झुनकी अपनी बेटी को हमेशा अपनी नज़रों के सामने रखती थी। वो बहुत ही सुंदर थी और वो नही चाहती कि उसकी बेटी को जमाने की हवा लग जाए, इसलिए उसे स्कूल तक जाने नही दिया। उसको लगता था कि अगर जवान बेटी कहीं किसी के साथ निकल ली तो उसकी बदनामी हो जायेगी। वो कहते हैं न जिसके दिल में चोर हो वो सबको ऐसे ही देखता है और ये तो डकैत के घर का किस्सा है।
उधर रमेश करवटें बदल रहा था। वो पांच भाई में सबसे बड़ा था। बहुत ही मन्नतों के बाद पांच बहनों के बाद वो दुनिया में आया था। हालांकि तीन बहन दुनिया को अलविदा कह गई थी। बचपन में ही वो कुपोषण का शिकार हुई थी। मां बाप बहुत ही गरीब थें। मेहनत मजदूरी से काम नहीं चलता था। मां ने तो जवानी बच्चो को पालने में और उन्हें बड़ा करने में ही निकाल दी। बाप एक अस्पताल में रसोई घर संभालता था। जब छुट्टी मिलती तो आता, बीवी के साथ थोड़ा समय गुजारता।
जब वापिस जाता तो खत में ये संवाद आता कि बीवी पेट से है। ख़बर आती और रमेश के पिता की नींद उड़ जाया करती थी। ओह बेकार ही गांव गया था। पता नही कैसे बड़े घराने में लोग दिन रात बीवी के साथ रहते हैं और एक से दो बच्चा रहता है। रहता तो वो डॉक्टर के पास ही था लेकिन शर्म के मारे कभी बोल ही नहीं पाया। पूछ ही नही पाया। दो बेटियों को छोड़कर बांकी बेटियां दुनिया को अलविदा कह चुकी थीं। बड़ा बेटा रमेश को बहुत लाड़ प्यार से पाला। जितना था उसी में उसको राजा बेटा बना के रखा ताकि बुढ़ापे में सहारा बन सके। रमेश से छोटे और बेटे थें। जैसे तैसे दोनो लड़कियों की शादी की। ब्याज पर पैसा लेकर कभी कुछ बचाया नहीं कि बुढ़ापे में ये बेटे काम आयेंगे। बीबी कुछ कहती तो रमेश के पिता कहते हमारे तो सारे बेटे ही फिक्स्ड डिपोजिट हैं।
बुढ़ापे में हम किस बात की चिंता करें, लेकिन भविष्य किसका कैसा है? वो तो भगवान ही जानता है। अब रमेश के छोटे भाई के उम्र के लड़कों की भी शादी हो चुकी थी और रमेश शादी करने का नाम नही ले रहा था। दोनों बहनों की शादी को भी अरसा हो गया था। बच्चे भी बड़े हो गए थे। अब रमेश की उम्र उसके बालों से पता चल रही थी, लेकिन वो शादी करने को तैयार नहीं था। घर वाले बहन-भाई सब परेशान हो गए थे लेकिन वो मान ही नहीं रहा था।
इधर झुनकी ने करवट में सुबह कर दी। अब बड़े लड़के की शादी कर दी। बहू भी आ गई थी। बेटी भी जवान थी। पति भी चारपाई पर लगभग आख़िरी सांस ही ले रहा था, लेकिन रमेश के बगैर झुनकी को चैन नहीं था। उसका वश चलता तो इन दो दीवारों को तोड़ देती और रमेश से जा मिलती लेकिन इतनी मजबूर वो कभी नहीं हुई जितनी वो आज हुई थी …।
उसे कपड़ो से ज्यादा मर्दों का शौक था। बचपन में मां गुज़र गई थी। कोई रोकने टोकने वाला था नही। सो सही गलत का पता नही। जब वो थोड़ी बड़ी हुई कि बुआ ने अपने किसी रिश्तेदार से कहकर हमारे गांव में उसकी शादी करवा दी। हालांकि मैं भी छोटी थी लेकिन इतनी भी नही कि छोटी बड़ी बातें धुंधली धुंधली सी मेरी आंखों के सामने टुकड़ों में याद आ रहे हैं। तभी मैं उनको जोड़कर ये वाकया आपके सामने लिख रही हूं और मेरे कहानी के सारे किरदार पढ़ना नहीं जानते। अपना हिसाब किताब कर लेते हैं लेकिन अगर गलती से किसी ऐसे शक्श ने कहानी पढ़ ली जो उनको भी जानता है और मुझे भी तो आप मेरे पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी पढ़ने के लिए तैयार रहिएगा और मेरी आत्मा की शांति के लिए कुछ शब्द लिख देना और एक लेखक की संतुष्टि कैसे हो सकती है।
झुनकी जब शादी के बाद आई तो उसका पति उसके आगे पीछे घूमता रहता था। उसके लिए उसने छोटे छोटे सोने के बूंदे बनवाए। उसकी भाभी के तो कलेजे पर सांप लोट गए क्योंकि इतने साल से तो वो सारी कमाई भाभी को ही देता था। भाभी ने उसकी कमाई से मिट्टी के गिलावे से जोड़कर घर बनवा लिया कि भविष्य में ईंट का बटवारा भी हुआ तो तुड़वाने में आसान रहेगा …। उस वक्त पूरे गांव में एक से ज्यादा दो घर में हैंडपंप हुआ होगा, तभी उसके पति ने उसके लिए आंगन में हैंडपंप गड़वा दिया। अब भौजी को तो काटो तो खून नहीं कि हम जिंदगी भर सरकारी कल से पानी पीते रहें और इनकी लुगाई आई नही कि पंप आंगन में।
ये छोटी छोटी बातें कलेश का कारण बन गई और एक आंगन में दो दीवार खींच गई।बेचारी झुनकी की सास जोकि जवानी में ही बेवा हो गई थी। मैने कभी उनको ब्लाउज में नही देखा। वो हमेशा साड़ी ही लपेटती थी। मैं अक्सर पूछती आप इस तरह के कपड़े क्यों पहनती हो? तो वो कहती कभी किसी ने पुराने कपड़े दे दिए और उसी से उसने गुज़ारा किया। कभी अपने छोटे से जमीन का टुकड़ा किसी को नहीं दिया। वो चाहती तो बच्चे को छोड़कर किसी और आदमी से व्याह कर सकती थी। जवान थी सुंदर थी लेकिन बच्चों के लिए उसने ये कुर्बानी दी थी लेकिन नई बहू के आते ही घर के टुकड़े हो गए। लगा कि जमीन फट जाए और वो उसमें समा जाए लेकिन सब सीता मईया थोड़े न हैं।
इस तरह दोनो बहू अलग हो गयी। झुनकी तो एकदम बेफिक्र हो गई। चूंकि बड़ी बहू को ज्यादा बच्चे थें, सास सोचती कि वो जो मेहनत मजदूरी करती है तो इसके बच्चे का कुछ भला हो जायेगा और छोटा बेटा थोड़ा ज्यादा कमाता था बड़े बेटे से और उसका कोई खाने वाला भी नही था..। छोटा बेटा परदेश में था। झुनकी की तो वही कहावत सही हो गई अंधा क्या मांगे दो आंखे….।
फिर धीरे धीरे उसके नए पुराने सारे चाहने वालों की संख्या बढ़ती गई। कभी कभी सुबह को उसके घर के आगे बड़ी बड़ी गाड़ी लगी रहती थी। लोग पूछते किस की है तो कहती मेरे बुआ का लड़का ट्रांसपोर्ट में काम करता है। रात में अंधेरे के कारण रुक गया और इस तरह वो अपना काम निकालती थी। गांव के लोग बेचारे सीधे ठहरे। उन्होंने किसी की जिंदगी में क्यों टांग डालना? उसका काम चल रहा था। बेचारा पति उधर फैक्ट्री में मजदूरी कर कर के इसको भेज रहा था पैसे। उधर छुट्टी के बदले पैसे काट लेते थें। इस चक्कर में वो बहुत कम आता और कभी कभी टेलीफोन से हालचाल पूछ लिया करता। उस जमाने में मेरे ही आंगन में टेलीफोन हुआ करता था। उसके पति का कम फोन आता बांकि और लागों का ज्यादा आता और मैं खुश होकर उसको बुलाने जाती। मेरे घर वाले मुझे डांटते रहते लेकिन मुझे ये बात बहुत बाद में समझ आई या अभी जब लिखने बैठी हूं तब कि उसके पाप का हिस्सेदार तो मैं भी थी जाने अंजाने में….।
फिर कुछ दिनों बाद उसके घर के आगे गाड़ी लगनी बंद हो गई थी। मैने पूछा भी था अब नही आते आपके गाड़ी वाले रिश्तेदार। क्यों नहीं आते? तो कहती अब रिश्तेदार की नौकरी कहीं और लग गई है। मैने गर्दन उचका कर ऐसे जता दिया कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा लेकिन मेरे अंदर का पत्रकार एक्टिव मोड में था। तभी तो इतनी सारी कड़ियों को जोड़कर आपके सामने ला रही हूं…।
फिर उसका दिल आंगन में जेठ के लड़के पर गया जोकि उम्र में उससे काफी छोटा था। कोई सोच भी नही सकता था कि इनकी सोच और आदत इतनी खराब है लेकिन जेठानी तेज निकली। उसने मामले का अंदाजा लगा लिया। लड़का हाथ से निकल जाएगा तो उसने बेटे को बाहर कमाने के लिए भेज दिया …।
अब झुनकी ने आंगन के दूसरे युवक पर नज़र डाली और उससे हंस हंस कर बात करती रही। आख़िरकार झुनकी ने उसको अपने झांसे में फंसा ही लिया। इधर इसके बच्चे बड़े हो रहे थे। समय व्यतीत हो रहा था। अब इस युवक की भी घरवालों ने शादी कर दी। अब नई बीबी के सामने पुरानी चाची को कौन पूछ रहा था? झुनकी को समझ में नहीं आ रहा था कि ये सब उसके हाथ से निकल कैसे चले जाते हैं? वो आदमी को रिजेक्ट करती थी, आदमी उसको कैसे रिजेक्ट कर सकता है? फिर उसने मामले को गंभीरता से लिया तो समझ में आया कि शादी होने से इनका मन बदल जाता है। अगर इनकी शादी ही न हो तो वो इसको छोड़कर नहीं जायेंगे।
सो उसने नजर घूमा के देखा तो सामने खेत में काम करता हुआ रमेश दिख गया। जो अभी ठीक से बालिग भी नही हुआ था। उसके शादी के वक्त ही उसका जन्म हुआ होगा क्योंकि वो उसके बड़े लड़के से थोड़ा ही बड़ा था …। लेकिन झुनकी इतना नही सोचती। लोक लाज मान मर्यादा सबको उसने ताक पर रख छोड़ा था …। रमेश को कैसे अपना बनाए और कैसे उसको अपनी मुट्ठी में रखे? यही उसके दिमाग में दिन रात चलने लगा। अब वो छोटे छोटे ब्लाउज, जिनके गले काफी गहरे होते थें। पीछे की तरफ पीठ पर एक हल्की सी पट्टी होती और एकदम सर्दी में भी सिफोन की साड़ी लहरा के पहनने लगी। जैसे उसे ठंड लगती ही न हो …।
पहले तो वो रमेश को कुछ कुछ बढ़िया खाने के लिए दे आती और उसी बहाने से हाथ को छू देती, जैसे अनजाने में छू दिया हो और रमेश अंदर से सिहर जाता। रमेश अभी बड़ा हो रहा था। उसके हार्मोंस चेंज हो रहे थे। उसके लिए ये सब नया था और गरीबी के कारण स्कूल जा नही पाया कि कोई दोस्त होती। उसे बहुत अच्छा लग रहा था लेकिन झुनकी तो इन सब में मास्टर हो गई थी। उसने तो इस फील्ड में पीएचडी कर रखी थी। पूरा सिलेबस उसको पता था। कैसे चैप्टर बाय चैप्टर काम करना है, सो इनकी स्टोरी शुरू हो गई …।
उधर रमेश ने साल भर पहले से कमाना शुरू ही किया था। मां बाप को अब लग रहा था कि उनके बुरे दिन समाप्त होने वाले हैं लेकिन उन्हें ये नही पता था कि अब मानसिक तनाव शुरू होने के दिन आ गए है। मुझे याद है मैं कभी भी उनके घर जाती, एक झोपड़ीनुमा घर उसमे ऊपर से नीचे तक सारे भाई बहन और मां। वो भी कमरा क्या कहें कि एक 3×4 की चौकी और सब नीचे में लुढ़के रहते थे और चारों बगल बांस के टाट और ऊपर फूस खिड़की के नाम पर कुछ नही बस चारो तरफ अंधेरा और उनके जीवन में जो प्रकाश लाता उनका बड़ा बेटा। उसके लिए अंधेरा खुद ही इंतजार कर रहा था…। जिसका नाम था झुनकी …।
पहले तो झुनकी रमेश को रात में ही बुलाती थी लेकिन उसका बड़ा बेटा अब बात को समझने लगा था तो झुनकी ने उसको काम करने बाहर भेज दिया ताकि उसके और रमेश के बीच कोई दीवार न रहे। रमेश ने धीरे धीरे काम से कमाए हुए पैसे अपने मां को देना बंद कर दिया। झुनकी की नजर रमेश के पैसों पर भी थी। रमेश के मां बाप कुछ कहते तो रमेश मरने की धमकी देता। अब बेचारे क्या ही करते? उधर झुनकी ने अपने बेटे से कहा कि मेरा सपना है कि मेरे बेटे की बीबी इस खपरैल घर में न आए। ईंट तो हमारे पास ही है जो इस मकान में है, बस छत बनाना है। तू मेहनत से पैसे कमा, मैं इस रमेश से फुसलाकर मजदूरी करवा लूंगी। मजदूर का कितना पैसा लगता है? ये फ्री में काम भी कर देगा और तू छत वाले घर का मालिक कहलाएगा …।
झुनकी के बेटे को ये बात बहुत अच्छी लगी और वो राजी ख़ुशी कमाने बाहर चला गया। उधर झुनकी ने अपने पति को भी कहलवा दिया कि आप चिंता मत करो। छुट्टी मत लो, पैसे काट लेते हैं। थोड़ी और मेहनत करो और इधर मैं इस घर को तुड़वा कर नया मकान बनवा दूंगी। सो रमेश भी साथ देने को तैयार है ….।
अब झुनकी ने अपना सारा रास्ता साफ कर लिया। अब जैसे ही उसने रमेश के साथ मिलकर घर तुड़वाना शुरू किया कि जिठानी तनकर सामने खड़ी हो गई। आधा ईंट तो मुझे भी चाहिए क्योंकि ये घर शादी से पहले का है और मैने इसमें बहुत मेहनत भी की थी और नियम भी यही कहता है….।
अब झुनकी तो झुनकी ठहरी। उसने ईंट देने से मना कर दिया और इस बात पर दोनो जीठानी देवरानी में लड़ाई शुरू हुई। बड़ी जीठानी उसे ताने मारने लगी कि तू तो इस तरह के काम करती है। छोटे बच्चे को भी नही छोड़ती। तेरे बेटे के उम्र का है ये लड़का कैसी आग लगी है तेरे अंदर। छोड़ दे उसको। तब रमेश के घर वाले भी आ गए लेकिन झुनकी ने रमेश को इतना अपने वश में कर लिया था कि रमेश उसको छोड़कर नहीं जा सकता था। रमेश के मां बाप तो मजबूर थे क्योंकि अब वो सीधे जान देने की बात करने लगा था।
अब तो इस झगड़े ने गांव वालों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि ये तो अलग ही तरह की दैत्य महिला है। इससे अपने बच्चों को बचा के रखना पड़ेगा लेकिन बूढ़ी तो हो चुकी थी और एक शिकार फांस रखा था। उसको वो ढील दे देती तो शायद उसके चंगुल में अब कोई नही आता .…। अभी सारे समाज के आगे पोल तो खुल गई थी लेकिन किसी की हिम्मत नही थी उसको कुछ कहे। ऊपर से बाबा ओम की बहुत बड़ी भक्तिन थी और चूंकि उसको थोड़ा बहुत मंत्र भी आता था तो गांव वाले ये सोचते कि अगर इससे मुंह लगाया तो ये कुछ कर न दे। तंत्र मंत्र गांव के सीधे लोगों का ये भी बहुत बड़ा पंगा होता है। उनके अंदर डर बहुत होता है। वो भगवान से, भूत से बहुत ही ज्यादा डर लगता है कि कहीं नाराज न हो जाएं…तो अब पूरे गांव को पता चल चुका था की झुनकी अपने से आधे उम्र के लड़के के साथ रहती है। वो उससे दूसरों के यहां मजदूरी करवाती और पैसे भी रख लेती और शाम को अपने घर बनवाने में काम करवाती। चूंकि उसके मां बाप भाई सब देखते उसे खाने के बहाने बुलाते लेकिन वो जाता ही नही कितनी भी कोशिश कर ली घर वालों ने वो वहीं दिन भर उसकी चोकठ पर बैठा रहता था…।
To be continued……….