जानिए कहाँ हुआ था राम-सीता स्वयंवर और इससे जुडी कथा

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ऋषि वाल्मिकी द्वारा लिखित रामायण और रामचरितमानस जैसी भारतीय पौराणिक कथाओं की मौलिक कृतियों में सीता के स्वयंवर की कहानी का विस्तार से उल्लेख है। यह एक महत्वपूर्ण घटना है जिसके कारण इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण युद्धों में से एक लंका का युद्ध हुआ। भगवान राम और सीता माता दोनों ही मानव रूप में असाधारण प्राणी थे, जो गुणों और धार्मिकता के प्रतीक थे। और इसलिए, उनका मिलन उन्हीं मूल्यों के एक साथ आने का प्रतीक है जो उन्होंने बचपन में हासिल किए थे। जानिए क्या थी राम-सीता स्वयंवर कथा –

कहाँ हुआ था राम-सीता विवाह ?

नेपाल के मिथिला क्षेत्र में जनकपुरधाम है। यहां जानकी मंदिर है। सीता के पिता राजा जनक ने यहां पर शासन किया था। कहते हैं सीताजी का स्वयंवर इसी मंदिर में हुआ था। इस मंदिर के पास ही एक मंदिर है ‘राम-सीता विवाह मंडप’ जिसमें राम और सीता का विवाह हुआ था। कहते हैं कि सीताजी भी यहां रही भी थीं।

राम-सीता स्वयंवर कथा

पौराणिक कथाओं के बारे में बात करें तो राजा जनक भगवान शिव के वंशज थे और भोलेनाथ का धनुष उनके राज महल में रखा था। एक बार महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर की घोषणा का साथ ये भी एलान कर दिया कि जो धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ा देगा, उसी से मेरी पुत्री सीता का विवाह होगा। शिव धनुष कोई साधारण धनुष नहीं था बल्कि उस काल का ब्रह्मास्त्र था। उस चमत्कारिक धनुष के संचालन की विधि राजा जनक, माता सीता, आचार्य श्री परशुराम और आचार्य श्री विश्वामित्र को ही ज्ञात थी। जनक राज को इस बात का डर सताने लगा था कि अगर धनुष रावण के हाथ लग गया तो इस सृष्टि का विनाश हो जाएगा। इसलिए विश्वमित्र ने पहले ही भगवान राम को उसके संचालन की विधि बता दी थी। जब श्री राम द्वारा वह धनुष टुट गया तभी परशुराम जी को बहुत क्रोध आया लेकिन आचार्य विश्वामित्र एवं लक्ष्मण के समझाने के बाद कि वह एक पुरातन यन्त्र था इसलिए संचालित करते ही टूट गया तब जाकर श्री परशुराम का क्रोध शांत हुआ। राम ने जब प्रत्यंचा चढ़ा कर धनुष को तोड़ा और माता सीता से उसका विवाह सम्पन्न हो गया।