Chapter-8: जादुई एहसास

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दिवाली

अगले दिन सभी लोग नई उमंग और उत्साह के साथ जागे। आज का दिन इस परिवार के लिए बहुत ही सुकून भरा और खुशहाल था। दिवाली का उत्साह सभी के चेहरे पर अलग ही दिखाई दे रहा था। सब लोग बहुत ज्यादा खुश थे। जितेश और विवेक दोनो ने सुबह उठकर घरवालों के पैर छुए और सब का आशीर्वाद लिया। और साथ ही सभी बेटे और बहुओं ने भी अपने सास-ससुर से आशीर्वाद लिया। उसके बाद सब लोग मंदिर गए और भगवान के दर्शन किए। घर आकर सभी ने नाश्ता पानी किया और उसके बाद ससुर जी ने सभी सदस्यों को दिवाली के तोहफे दिए। ससुर जी ने कहां कि, “बहुएं तो घर की लक्ष्मी होती हैं।” उन्होंने सबसे बड़ी बहू को मांग टिका दिया। प्रिया को बाजूबंद दिया और सुमन को एक सोने का हार दिया।

यह देख कर मधु कहने लगी, “यह क्या पिताजी, आपने मुझे यह हल्का सा मांग टिका दिया है और सुमन को सोने का सेट दिया है।” तब पिताजी बोलते हैं कि, “बहू यह तुम कैसी बात कर रही हो। सुमन इस घर की छोटी बहू है। तुम्हें तो खुश होना चाहिए उसके लिए। तुम्हें याद है जब तुम इस घर में बहू बनकर आई थी तो तुम्हें कितने सारे उपहार और गहने मिलते थे। सुमन तो सबसे छोटी है अब उसकी बारी है तो तुम लोगों को खुश होना चाहिए ना कि उससे जलना चाहिए।” इतना सुनकर मधु चुप हो गई।

इसके बाद पिताजी ने अपने दोनों पोतों को सोने की चैन उपहार में दी। इसके बाद सब लोग हंसी-खुशी अपने अपने कामों में लग गए। घर के बेटे आस-पड़ोस और रिश्तेदारों में मिठाइयां बाँटने चले गए और घर की औरतें घर को सजाने में, रंगोली बनाने में और शाम को होने वाले लक्ष्मी पूजन की तैयारियों में लग गई। उन्होंने घर में बहुत सारे अलग-अलग प्रकार की मिठाइयां और पकवान भी बनाए। सब ने साथ बैठकर खाना खाया और खूब मजे किए।

दोपहर के वक्त सब लोग एक साथ हॉल में इकट्ठे होकर हंसी ठिठोली करने लगे। पिताजी ने कहा, “वाह भाई, आज पूरे परिवार को एक साथ बैठा देखकर कितनी खुशी हो रही है।” तभी राकेश ने खिलखिलाते हुए कहा, “हां पिताजी, वैसे चाहे वक्त मिले ना मिले लेकिन त्योहारों के समय सब को छुट्टी मिल जाती है। और सब को एक दूसरे के साथ वक्त बिताने का मौका मिलता है।” तभी विकास कहता है, “आप ने सच कहा भैया, और वैसे भी त्योहारों के समय में जो हमारे यहां उत्साह और खुशियां देखने को मिलती है उसकी तो बस पूछो ही मत। पूरे साल इंतजार करते हैं कब दिवाली आएगी और कब पटाखे जलाने को मिलेंगे।” इतना सुनकर सब ठहाके से हंसने लगते हैं।

तब उमेश कहता है, “हमारा विकास अभी तक बच्चा है। इसे तो बस दिवाली पर पटाखों की खुशी होती है। दस दिन पहले से यह सोचने लगता है कौन-कौन से पटाखे लेने हैं और कौन-कौन सी मिठाइयां खानी है।” यह सुनकर सब लोग फिर से जोर से हंसने लगते हैं। तभी विवेक आकर अपने दादाजी के पास बैठता है और कहता है, “चलिए ना दादा जी आज सब लोग एक साथ इकट्ठे बैठे हैं तो चलिए मिलकर सब लोग कुछ खेलते हैं।” दादा जी कहते हैं, “ठीक है भाई, जैसी तुम लोगों की मर्जी।” तभी मधु कहती है, “चलिए आज सभी लोग मिलकर एक अनोखा खेल खेलते हैं। और ये खेल बहुत ही खास होगा।” तभी प्रिया उत्साह से मुस्कुराते हुए पूछती है, “कौन सा खेल दीदी, जल्दी बताइए।”

मधु कहती है, “आज हम सब लोग एक नाटक खेलेंगे जिसमें सबको अपने पसंदीदा किरदार के जैसा बनना होगा और वह अपनी खुशी से किसी भी किरदार को चुन सकता है। उस नए अवतार में आकर कुछ ऐसा करना होगा जिससे कि सबका मनोरंजन हो।” तभी सुमन कहती है, “वाह दीदी क्या मस्त आइडिया है। बहुत मजा आएगा इसमें।” सब लोग बहुत खुश हो जाते हैं और बहुत ही उमंग और खुशी के साथ एक दूसरे से बातें करने लगते हैं। राकेश कहता है, “भाई मैं तो कुछ हटके करने वाला हूं। मेरा किरदार तो बहुत ही शानदार होगा।” उमेश पूछता है, “भैया आप क्या बनोगे।”

तब राकेश कहता है कि, “यह सरप्राइज है और मैं अभी नहीं बताऊंगा।” फिर मधु कहती है, “अरे अभी इन सब बातों पर बहस छोड़िए और जाकर अपने अपने किरदार की तैयारी कीजिए। अगर यही बहस करते रहे तो कुछ नहीं होगा और शाम की पूजा का भी समय भी हो जाएगा। यह सुनकर विकास ने कहा, “नहीं भाभी हमें खेल खेलना है।” तब दादा जी कहते हैं, “तो एक काम करो, सब लोग फटाफट अपने कमरे में जाओ और आधे घंटे के अंदर अंदर अपने अपने किरदार में तैयार होकर आओ। जो भी लेट हुआ उसको दंड मिलेगा और यह दंड क्या होगा वो मैं बाद में तय करूंगा।” इतना सुनकर सब लोग अपने अपने कमरे में चले जाते हैं और अपने अपने किरदार की तैयारी करने लगते हैं। तब तक मधु और प्रिया ने हॉल में से सोफा एक तरफ लगा दिए थे जिन पर सब बैठकर कार्यक्रम देख सकते थे और बीच में कालीन बिछा कर एक मंच तैयार कर दिया था। इतना काम फटाफट निपटाने के बाद वह दोनों भी तैयार होने चली गई।

तय समय पर सब लोग हॉल में जमा हुए। हाल में पूरा अंधेरा था और बस कुछ मोमबत्तियां जल रही थी जिससे बहुत ही हल्की हल्की सी रोशनी आ रही थी। कोई भी किसी को पहचान नहीं पा रहा था कि किसने क्या किरदार चुना है। सबसे पहले दादा जी और दादी जी स्टेज पर आए उन दोनों ने लक्ष्मी जी और विष्णु भगवान के कॉस्ट्यूम पहने हुए थे। और उन्होंने एक बहुत ही सुंदर सी झलक प्रस्तुत की। ऐसा लग रहा था मानो साक्षात भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी प्रकट हुए हो और पूरे परिवार को आशीर्वाद देने आए हो।

सब लोग मदहोश होकर उनकी प्रतिभा देख रहे थे। परफॉर्मेंस खत्म होने के बाद सब लोगों ने तालियां बजाकर उनका स्वागत किया। इसके बाद अगला नंबर मधु और राकेश का आया और उन दोनों ने राम सीता जी की झांकी प्रस्तुति की। जिसमें दिखाया गया था कि जब राम जी लंका विजय करके अयोध्या वापस लौटे तो कैसे अयोध्या वासियों ने दीपक जलाए और दिवाली का त्यौहार मनाया। उनकी झांसी एकदम लाजवाब थी। इसी तरह एक एक करके बारी-बारी सबने अपनी-अपनी झांकियां प्रस्तुत की और सबका मनोरंजन किया। सब लोगों ने बहुत मजे किए इसके बाद सब लोग जाकर आराम करने लगे। शाम के वक्त सब लोग तैयार हुए और पूजा की तैयारी में लग गए। शाम को पूजा पाठ करने के बाद खाना-पीना किया और उसके बाद सब पटाखे जलाने लगे। इस तरह हंसी खुशी उनका दिवाली का त्यौहार पूरा हुआ।

To be continued….

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