रक्षाबन्धन: बंधन स्नेह और आत्मीयता का

एडवोकेट ममता शर्मा बीए.एलएल.बी., एलएल.एम., पीएचडी (लाॅ) रिसर्च स्कॉलर, इंडियन एंड वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर, एजुकेशनिस्ट, सोशलिस्टलिस्ट, लाॅ एक्सपर्ट, लेखक, स्पीकर, करियर काउंसलर, लाइफ कोच

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भाई बहन का पवित्र बंधन तोड़ने से भी नहीं टूटता, रक्षा सूत्र में बांधी गांठों की तरह यह रिश्ता भी उतना ही मजबूत और दुनिया का खूबसूरत रिश्ता होता है। जो ईश्वर से हमें उपहार में मिलता है। सभी रिश्तो से न्यारा है यह रिश्ता एक ऐसा बंधन जो सुख-दुख में साथ निभाने का मिल बांट कर, हर दुख से परिस्थिति से लड़ने का।मिलकर साथ सदा मुस्कुराने का भाई-बहन के इस पवित्र बंधन का कोई मूल्य नहीं होता सभी रिश्तो से बहुमूल्य है यह रिश्ता। बहन के लिए अपने प्राणों से भाई प्यारा होता है। रिश्ता बहन का खून का हो या धर्म का जब बात निभाने की आती है तो भाई अपनी बहन के लिए उसके सपनों के लिए उसकी मंजिल के लिए कुछ भी कर गुजरता है। ताकि उसकी बहन खुश रह सके अपनी मंजिलों को पा सके। अपनी बहन को हमेशा बुरी नजरों से बचाने की कोशिश करता है। भाई बड़ा हो या छोटा रखता है वह एक मां की तरह अपनी बहन का ख्याल एक पिता की तरह उसे संभालता है। उसकी हर खुशी का उसकी हर छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखता है। पवित्र रिश्ता भाई-बहन का, सुख-दुख में एक दूसरे का साथ निभाने का, हमेशा एक दूसरे की रक्षा करने का, बंधन है यह इतना पवित्र स्नेह और आत्मीयता का। रिश्ता खून का हो या धर्म का भाई-बहन के रिश्ते में ना कोई जाति ना कोई मजहब दीवार होती है। यह तो दुनिया का सबसे पवित्र रिश्ता होता है, जहां भाई-बहन का एक दूजे के लिए प्यार होता है। एक दूसरे का आदर सम्मान होता है। रिश्ता है इतना अनोखा एक भाई अपनी बहन के लिए अपनी जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटता। हर परिस्थिति में उसका साथ देने की कोशिश करता है। यहां अमीर-गरीब, उच्च-नीच का कोई भेद नहीं होताहै। भाई अपनी बहन को जब वह अपने जीवन की विपरीत परिस्थितियों से गुजरती है तो उसको एक नई राह दिखाता है। एक नया सपना दिखाता उसे उसकी मंजिल तक पहुंचाता है। कॉलेज ले जाना वहां से लाना समाज के ताने और आलोचनाएं सहना। एक भाई अपनी बहन के लिए हमेशा इतना पजेसिव होता है कि कोई बुरी नजर उस पर ना पड़ सके हमेशा उसे बचाता है। हर कदम पर भाइयों का साथ सदैव उसके साथ रहता है कभी खट्टी कभी मीठी तकरारें वो तो आपस में होती ही रहते हैं। भाई बहन का रिश्ता एक अनोखा युगो युगों-युगों से अपनी बहन की रक्षा के लिए एक भाई अपने रिश्ते को बड़े स्नेह और आत्मीयता से निभाता है। जब एक बहन अपने भाई की कलाई में रक्षा सूत्र का वह पवित्र धागा बांधती है, तो सुरक्षा सूत्र के धागों की तरह उस रिश्ते में इतनी पवित्रता होती है, इतनी मजबूती होती है, जितनी रक्षा सूत्र की डोरी की गांठें। जितनी। ये पवित्र प्यार का रिश्ता है। इसलिए रक्षाबंधन हमारी संस्कृति की पहचान है और हर भारतवासी को इस त्योहार पर गर्व है। आज कई भाइयों की कलाई पर राखी सिर्फ इसलिए नहीं बंध पाती क्योंकि उनकी बहनों को उनके माता-पिता ने इस दुनिया में आने ही नहीं दिया। यह बहुत ही शर्मनाक बात है कि जिस देश में कन्या-पूजन का विधान शास्त्रों में है वहीं कन्या-भ्रूण हत्या के मामले सामने आते हैं। यह त्योहार हमें यह भी याद दिलाता है कि बहनें हमारे जीवन में कितना महत्व रखती हैं। भाइयों और बहनों के लिए रक्षा बंधन का एक विशेष महत्व है। यह त्योहार सिर्फ सामान्य लोगों द्वारा ही नहीं मनाया जाता है, बल्कि इसे देवी-देवताओं द्वारा भी भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को कायम रखने के लिए मनाया जाता रहा है। रक्षाबंधन का भाईयों-बहनों के लिए एक खास महत्व है। इनमें से कई सारे भाई-बहन एक-दूसरे से व्यावसायिक और व्यक्तिगत कारणों से मिल नहीं पाते, लेकिन इस विशेष अवसर पर वह एक-दूसरे के लिए निश्चित रुप से समय निकालकर इस पवित्र पर्व को मनाते हैं, जो कि इसकी महत्ता को दर्शाता है। हमें इस महान और पवित्र त्योहार के आदर्श की रक्षा करते हुए इसे नैतिक भावों के साथ खुशी-खुशी मनाना चाहिए।

भाई-बहन का रिश्ता बहुत खास होता है, जिस तरह से वह एक-दूसरे की चिंता करते है, उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती है। भाई-बहन के बीच का रिश्ता अतुलनीय है, वे चाहे छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से कितना भी लड़ाई-झगड़ा करें, लेकिन फिर भी वह एक-दूसरे के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं हटते। जैसे-जैसे वह बड़े होते जाते हैं जीवन के विभिन्न समयों पर यह रिश्ता और भी ज्यादा मजबूत होता जाता है। बड़े भाई अपनी बहनों की सुरक्षा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, इसी तरह बड़ी बहनों द्वारा भी अपने छोटे भाइयों का मार्गदर्शन किया जाता है। भाई-बहन के इसी प्रेम के कारण यह विशेष पर्व मनाया जाता है। रक्षा बंधन का त्योहार हर भाई-बहन के लिए बहुत खास होता है। यह उनका एक-दूसरे के प्रति आपसी स्नेह, एकजुटता और विश्वास का प्रतीक है।रक्षा-बंधन का पौराणिक प्रसंग भी सदियों पुराना है। रक्षाबंधन का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है।

द्वापर युग में श्री कृष्ण और द्रौपदी की कहानी प्रसिद्ध है, जिसमें जब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी, और इस उपकार के बदले श्री कृष्ण ने द्रौपदी को किसी भी संकट में द्रौपदी की सहायता करने का वचन दिया था और उसी के चलते कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबन्धन के पर्व में यहीं से प्रारम्भ हुई। राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में रेशमी धागा भी बाँधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आयेगा। रक्षाबंधन के साथ एक और प्रसिद्ध कहानी जुड़ी हुई है। कहते हैं, मेवाड़ की रानी कर्णावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व सूचना मिली। जब रानी कर्णावती को सूचना मिली कि युद्ध में मेवाड़ हार रहा है, रानी लड़ने में असमर्थ थी अत: उसने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेज कर मेवाड़ की रक्षा की याचना की। हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्णावती व उसके राज्य की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकन्दर की पत्नी ने अपने पति के हिन्दू शत्रु पोरस को राखी बाँधकर अपना मुँहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकन्दर को न मारने का वचन लिया। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिये रक्षाबंधन का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि रक्षा सूत्र के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। इस समय द्रौपदी द्वारा श्रीकृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को रक्षा सूत्र बाँधा गया था। इस दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बाँधकर उसके माथे पर तिलक करती हैं और उसकी लंबी आयु की कामना करती हैं। बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बन्धन को मज़बूत करते है। यह एक ऐसा पावन पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है।
रक्षाबन्धन पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता या एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपाय रहा है। विवाह के बाद बहन पराये घर में चली जाती है। इस बहाने प्रतिवर्ष अपने सगे ही नहीं अपितु दूरदराज के रिश्तों के भाइयों तक को उनके घर जाकर राखी बाँधती है और इस प्रकार अपने रिश्तों का नवीनीकरण करती रहती है। दो परिवारों का और कुलों का पारस्परिक मिलन होता है। समाज के विभिन्न वर्गों के बीच भी एकसूत्रता के रूप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार जो कड़ी टूट गयी है उसे फिर से जागृत किया जा सकता है। लेकिन आज हम 21वीं सदी में और टेक्नोलॉजी के संसार में जी रहे हैं जहां आज भाई बहन कितने सालों तक आपस में नहीं मिल पाते हैं। ऐसे में बहने अपने भाइयों को पोस्ट के द्वारा राखी भेजती है। आज के आधुनिक युग में वर्चुअल त्योहार मनाए जाते हैं। आज कलयुग में रिश्ते भी कलयुगी हो गए हैं। कई जगहों पर नफरत देखने को मिलती है। आज मानव लालच के वशीभूत होकर रिश्तो की मर्यादा को भूल जाता है। भाई बहन का रिश्ता तो पवित्रता, स्नेह, प्यार और आत्मीयता की डोर का है, जो सभी रिश्तो से ज्यादा मजबूत है। एक-दूसरे के मान-सम्मान एक दूसरे पर प्राण न्योछावर करने का पवित्रता का है यह बंधन।